आँचल

उनके घर में काफी़ गमगीन वातावरण चल रहा था.... उनके एकमात्र पुत्र के तलाक का मामला कोर्ट में चल रहा था.....
सारा घर दुखी और परेशान ....बदनामी अलग...
उनको देख कर हल्की फुल्की कानाफूसी भी हो जाती थी...
इससे वो बहुत आहत हो रही थी.....
मन ही मन तरह तरह के सवालों के कठघरे मे फंस जाती थी....
अक्सर सोचती.... ये आजकल के बच्चे बहुत आजाद ख्याल के हो गए है...... 
अपने बड़ो की...मां बाप की तो जैसे कोई वैल्यू ही नही है... 
सब लोग हमें ऐसी निगाहों से देखते हैं... मानो हम ही गुनहगार हैं... ...
दूसरे ही क्षण वो स्वयं को कोसने लगती... 
तू ही सबसे बड़ी अपराधिनी है...... 
क्या तेरा कोई कर्तव्य नही था...तेरे बच्चों की दुनिया उजड़ रही थी...और तू मूकदर्शक बनी तमाशा देखती रही......
लेकिन कुछ आपसी सहेलियों के बहकावे में आकर उसने स्वयं ही तो विवेक की बुद्धि को घुमा दिया था ....वो एक मार्डन बहु लाने के सपने संजोए बैठी थी सहेलियों मे स्टेटस जो बनाना था.....इसलिए दोनों मे मनमुटाव बढने दिए और .....आज नौबत दोनों के तलाक तक पहुंच चुकी थी और आज जब उन सहेलियों के घरों में उनकी मार्डन बहुओ द्वारा उनका तिरस्कार होते हुए देखती तो उसे अपनी संस्कारों वाली बहु मेधा की यादें आती कैसे वो उनकी इज्ज़त करती थी खानपान से लेकर उनकी हर सुविधाओं का ध्यान रखती थी ....मगर उन्होंने...
काश.....वो समझदारी से काम लेती ...
जरा बेटे के कान खींचती... ...
जरा घर से निकलती बहू का हक से हाथ पकड़ लेती... इन्ही सब के भंवरजाल मे डूब उतरा रही थी...
तभी जोर से कॉलबैल बजी...वो धम्म से धरातल पर आ गईं,"अरे रामलाल.... देखना तो कौन है.... 
उनकी बात उनके गले ही में अटक गई और मेघा दौड़ कर उनके गले लग गई...... 
वो अविश्वास भरी आँखों से उसे लगातार देखे जा रही थी...
"मम्मी जी.... कैसे देख रही हैं... मैं मेघा... आपकी.....
उसका गला रुँध गया... वो आगे बोल नही पा रही थी...
पर उन्होने उसे इतना कस कर छाती से लगा लिया.. मानो डर हो ...कहीं फिर से ना चली जाए।
"रुक क्यों गई मेरी लाडो.....बोल ना आपकी बहू ...आपकी बेटी......
तेरे बिना मैं कितनी अधूरी हो गई थी....

"पर मम्मी.... कल कोर्ट में आखिरी फैसला हो जाएगा... फिर हमारी राहें अलग......
पर एक बात बताइए....आप मेघा को प्यार करती थी या अपने विवेक की पत्नी को...दिल पर हाथ रख कर सही बोलिएगा....

"बेटा, ये कैसा अटपटा सवाल है... मेघा यानि तू और मेरे विवेक की बहू दोनों एक ही तो है....

"नही मम्मी जी.... अगर दोनो एक थी तो आपने मुझे एक बार भी फोन क्यों नही किया  ... 
मुझसे मिलने की कोशिश क्यों नही की...
विवेक को उस दिन सबके सामने चाँटा मारने के लिए टोका क्यों नही... समझाया क्यों नही.... 
मुझे भी क्यों नही रोका... बताइए ना...क्यों नही रोका....आपको हक था..मेरा हाथ पकड़ लेती....

वो इस वज्रपात के लिए तैयार नही थी......
सीधी सरल महिला थी...और स्वयं भी जीवन में सदा ही समझौते ही तो करती आई थी...
रोते हुए बोली,"हां.... मैं तेरी और विवेक दोनों की ही कुसूरवार हूं.......
पर सब इतना अनायास हुआ कि कुछ सोच समझ ही नही पाई......और जब होश में आई तो चिड़ियां पूरा खेत ही चुग गई थी......
और फिर वकीलों के आरोप प्रत्यारोपों ने तो बची खुची उम्मीद भी धूमिल कर दी....

"आप सिर्फ आप एक बार तो आवाज देकर देखती... कभी आपकी बात का निरादर किया है....
उन्होने अपना आँचल उसके सामने फैला दिया...
"हो सके तो अपनी इस नासमझ मां को क्षमा कर दे...
एक मौका और देकर अपना घर बचा ले...ये घर तेरा है और तेरा ही रहेगा....
उसने  दौड़ कर उनके आँचल की छाँव में आँखे मूँद ली पर कनखियों से विवेक को भी अपने आँसू पोंछते देख लिया था....
एक सुंदर रचना...
#दीप...🙏🙏🙏

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